Tuesday, 20 September 2011

'स्पर्श'

'स्पर्श'

समुद्र की अथल गहराइयों के
गाढ़े खारेपन में
शैवाल से ढकी चट्टानें स्पंदित होती हैं
मैं उन्हें पक्ष्मों से छूना चाहती हूँ.

Friday, 26 August 2011

'किताबें होती लड़की'

'किताबें होती लड़की'

किताबों से अटी 
घर की कार्निस, मेजें और अलमारियां                                                      
पिता के किताबों से गहरे लगाव की
मौन पुष्टि करती थीं. 
घर के कमरे
किताबों के अभाव में रूखे दिखते हैं
पड़ोसियों और दोस्तों के घर जाकर                 
जाना लड़की ने
महंगे सजावटी सामान से सजे
वे कमरे                                                                                   
लड़की को थके और निष्प्रभ लगते.

पढ़ने  की लत,  लड़की को पिता से मिली थी
खाने की मेज़ पर,  माँ की डांट भी
उसे किताबों से दूर नहीं रख पाती
खाना खाते वक़्त, आज भी
लड़की जब कुछ पढ़ती है
माँ की अदृश्य आवाज़ में उलाहना सुन ही लेती है.

इतिहास की पुस्तकें पढ़ना
लड़की को पसंद आता
लेकिन दर्शन
सिर के ऊपर से निकल जाता
और साहित्य में,
कविता, कहानी, उपन्यास सभी कुछ भाता.

घर में पत्रिकाएँ भी खूब आतीं
'धर्मयुग' और 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' से
दोस्ती उन वक्तों से थी
जबसे लड़की ने
अक्षर-अक्षर मिलकर शब्द पढ़ना सीखे
लड़की को याद है,
चार-पांच बरस की रही होगी वह
आबिद सुरती घर आये थे तब 
पिता से मिलने
ढब्बू जी ने
'धर्मयुग' के पृष्ठों से बाहर निकल
थोड़ी जगह लड़की की कॉपी में
तलाश ली थी
और लड़की ने 'कॉपी के ढब्बू जी' को
अपने सभी दोस्तों से मिलवाया था

उम्र बढ़ी, सोच का दायरा बढ़ा
किताबों के सान्निध्य  ने
लड़की को  शफ्फाक शीशे की मानिंद
पारदर्शी तार्किकता दी.

समय की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते 
वह दिन भी आया
जब लड़की ने अपना अलग घरौंदा बनाया 
किताबों से दोस्ती
टूटी नहीं तब भी
पिता जब भी नई किताब खरीदकर लाते
लड़की प्रफुल्लित हो जाती.
किताब पढने के बाद,
पिता-बेटी तन्मयता से
सविस्तार चर्चा करते उसपर
लड़की की समझ पर
पिता गर्वित हो उठते
और अक्सर ऐसे मौकों पर
भावुक हो लड़की को
अपना बौद्धिक वारिस बताते 
उनके जाने के बाद, उनकी किताबें
लड़की की धरोहर हैं,
पिता लड़की से कहा करते
लड़की सुनती और मुस्कुरा देती.

माँ गईं, फिर अनंत शून्य
पिता को भी लील गया.
लड़की ने महसूस किया
पिता के अवसान पर,
उसके रुदन में
पिता की किताबों का स्वर
सम्मिलित था.

माँ-पिता की गृहस्थी
मकान, घरेलू सामान,
रुपए-पैसे और गहनों में
तब्दील हो गई थी
जिसे तकसीम होना ही था
लड़की और उसके सहोदरों के मध्य
उस दिन, लड़की ने क्षण-भर सोचा
और अपने हिस्से में  धूप की तरह 
पिता की कुछ किताबें मांग ली.
इसे लड़की की नासमझी
और गैर -दुनियादाराना रवैये
की नज़र से देखा गया
लेकिन लड़की जानती थी
पिता अपना बौद्धिक उत्तराधिकारी
उसे ही मानते थे
उनकी बौद्धिक संपत्ति पर
हक़ उसी का था.

पिता की वे किताबें
लड़की ने
शादी में मिली माँ की साड़ियों सी
सहेज-संभालकर रखी हैं
पिता याद आते हैं  जब भी
उनकी किताबें
लड़की को पास बुला लेती हैं 
किताबें
जिनके पहले पन्ने पर                                                          
पिता के हस्ताक्षर में निहित
उनकी अशेष स्मृतियाँ
दोहराती हैं - 
शब्द ही शाश्वत हैं,
अक्षुण्ण हैं,  उम्र की जद से परे.
लाल फूलों से खिलते हैं
सृजन और विचार
शब्दों में ही!

Friday, 5 August 2011

तुम्हारा साथ मेरी सबसे कीमती , सबसे सुन्दर धरोहर है



तुम्हारे साथ पहाड़ी जगहें देखी है मैंने
और रेतीला समुद्र भी 
इन जगहों पर तुम्हारा साथ 
मुझे पृथ्वी सा विस्तार देता है
मन की भीतरी परतों में नया सूरज उग आता है
मैं बार- बार कहती हूँ, खुद से,
'तुम्हारा साथ मेरी सबसे कीमती , सबसे सुन्दर धरोहर है...'

आसमान की नीली चादर पर टंके तारों से बतियाया है
तुम्हारे साथ ,
और रात ने मुझमें से गुजरकर 
नए  नक्श गढ़े हैं
ऐसी ही रातें होती है जब मैं 
हथेलियों में मुलायम ऊष्मा समेटती हूँ
नम रेत पर युगों तक वह रात नदी बनकर बहती है .




Wednesday, 3 August 2011

'मैं...तुमसे प्रेम करता हूँ'

'मैं...तुमसे प्रेम करता हूँ'

मैं
तुमसे प्रेम करता हूँ इसलिए 
तुम मेरा घर संभालो 
मद्धिम आंच में सिंझी तरकारी और
भाप उगलती, नर्म चपातियाँ पकाओ मेरे लिए
--- पुरुष ने कहा, स्त्री ने सुना.

मैं
तुमसे प्रेम करता हूँ इसलिए 
तुम मेरे बच्चे संभालो 
सही संस्कार और गुण बोओं उनमें 
उन्हें दुनिया का सामना करना सिखाओ 
मैं फख्र से कह सकूँ -- मेरी संतति हैं ये 
--- पुरुष ने कहा , स्त्री ने सुना.

पुरुष ने कहा,
'सुनो, मैं तुमसे प्रेम करता हूँ  इसीलिए कहता हूँ 
तुम महफूज़ हो मेरे बनाये दायरों में 
मत झांको , इस दहलीज़ के बाहर
बाहर की दुनिया में
अन्याय है , असमानता है , शोषण है'
स्त्री ने सुना यह भी
लेकिन इस बार, एक तिर्यक लकीर 
स्त्री के अधरों पर खिंची थी. 

Wednesday, 27 July 2011

' एक और उम्र चाहिए मुझे...'



एक और उम्र चाहिए मुझे...


एक और उम्र चाहिए मुझे
फिर से यह कहानी दोहरा सकूँ
इन बैचैन से ख्यालों को बोने के लिए
नए चाँद के उगने तक परती ज़मीन तलाश सकूँ

धीमी आवाज़ में ये सिकुड़न , ये सिलवटें न हों 
जो वक़्त जिया है तुम्हारे साथ 
उसे शब्दों का बेबाक़ लिबास ओढ़ा सकूँ
खिड़की  के कांच पर जमी स्मृतियों को 
अपनी उँगलियों की छुअन से चौका दूँ 
और बारिश जब भी छूना चाहे क्षितिज की लालिमा
मेरे मन की दीवारें तुम्हारे अहसास की नमी से भीगी हों 

शब्दों की पगडंडियों से एक और उम्र नापने की चाहना
रूखी रेत सी मेरे भीतर ठहर जाती है
उस सुनसान रात 
पहाड़ों पर बिखरी बर्फ की मानिंद
तुम चुपचाप अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाते हो.


Thursday, 30 June 2011

' तुम्हारी हथेलियों की हर एक इबारत में मेरा ज़िक्र हो...'

तुम्हारी हथेलियों की हर एक इबारत में मेरा ज़िक्र हो...

तुम्हारी हथेलियों की हर एक इबारत में
मेरा ज़िक्र हो, ये ज़रूरी तो नहीं
लेकिन क्या यह भी मुमकिन नहीं कि
 ज़िन्दगी की जिस किताब को तुम रोज़ पढ़ते हो 
उसके कुछ हर्फों में मैं अपना अक्स पहचान सकूँ...
तीखी धूप की तपिश में गुलमोहर का दरख़्त बनना चाहती हूँ
जिसकी सुर्ख छाँव जब भी तुम्हारे आस-पास बिखरे
मेरी परछाई का हर रंग उस में शामिल हो 

Wednesday, 29 June 2011

''कुछ कहना चाहेंगे आप ?"

'कुछ कहना चाहेंगे आप ?'
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स्त्री को बतलाने का शौक है
धूप का टुकड़ा मचलता है जैसे
देखकर अपनी परछाईं पानी में
स्त्री के ज़हन में कुलबुलाते हैं शब्द
बाहर आने को हमेशा बेचैन,

बतरस के उत्प्रेरक ने
स्त्री को कई उम्दा दोस्त बख्शे
औरतें भी, आदमी भी,
उम्र की जद से दूर,
सोच और विचारों की एकरूपता ही
-स्त्री के मुतल्लिक,
दोस्त बनाने की इकलौती शर्त होती
स्त्री के जीवन का विस्तीर्ण अंश रहे
इन दोस्तों में कुछ तो, शब्दों के पुल पर
चलकर ही स्त्री तक पहुँचते.
'रु-ब-रु एक दूसरे को जानना,
प्रेमियों के लिए ज़रूरी है, दोस्तों के लिए नहीं.'
स्त्री कहा करती.

दोस्तों की इस फेहरिस्त में
उसका नाम भी था
हालाँकि, निजी तौर पर स्त्री उसे नहीं जानती थी
फ़ोन पर भी महज़
दो ,या शायद तीन मर्तबा बात हुई थी
चेहरा, यकीनन अजनबी ही था
लेकिन, स्वर में बेलौस अपनापन
बौद्धिकता की गरिमा से भरे शब्द
स्त्री को आह्लादित कर जाते
इस आह्लाद में प्रेम-व्रेम का तत्व नहीं
दोस्ती की ऊष्मा पसरी रहती
- या कि  स्त्री को ऐसा प्रतीत होता
क्योंकि उवाचित शब्दों की चौहद्दी से परे झांकना
स्त्री को अतार्किक और अनर्थक लगता.

फिर एक दिन, अलसुबह, फ़ोन घनघनाया,
स्क्रीन पर उसका नाम चमक रहा था
अचरज और खीझ की मिली-जुली लकीरें
स्त्री के चेहरे पर खिंच आईं
फ़ोन उठाने पर, दूसरे छोर से आती आवाज़ में
जानी-पहचानी गरमाहट नहीं है
बस, नश्तर की तरह चीरता हुआ ठंडापन
कानों को सुन्न करता जा रहा है
खुदाया, यह क्या? वही आदिम सोच,
उसके साथ अन्तरंग होने आमन्त्रण है
बेहद सपाट अंदाज़ में
गोया, कह रहा हो
चलो, साथ कॉफ़ी पिएँ!
शीराज़ा बिखर रहा है किरच-दर-किरच
मज्जा तक फैलती पीड़ा चुभ रही है 

फ़ोन पटकने के बाद, स्त्री देर तक सिर धुनती है
पुरुष और स्त्री के संबंधों का अंतिम आयाम
बिस्तर ही क्यूँ ?
इस अनुत्तरित प्रश्न पर कुछ कहना चाहेंगे आप ?

--- ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस